Thursday, 20 November 2014

एक ज़ख्म...

दिल पर ज़ख्म देकर वो महोब्बत जताने आये है,
वो गैरों से मिलकर, देखो हमे मिलने आये है.

लौ तो बुज़ गई, राख़ भी उड़ गई कब की,
अँधेरा देखकर वो अब चिराग जलाने आये है.

जिस जालिमोंने उसको मार डाला बेरहमीसे,
आज वही सरे लोग उसे कन्धा देने आये है.

जिसे सिर्फ अँधेरा ही नसीब हुआ जिंदगीभर,
उसकी कब्र पर आज यो दिया जलाने आये है.

रिश्तोके मेले में संभलकर जाना मेरे दोस्त,
यहाँ लोग दिल मिलाकर दिल निकालने आये है.

                                        - चेतन सोलंकी 'गुमनाम'

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